दूनिया में मानव
तस्करी को सबसे बड़ा अपराध
माना जाता है पर इसमें
हैरानी यह है कि 155 देशों
में से 62 देशों
में आज तक ‘‘मानव तस्करी’
के मामले में
एक को भी अपराधी नहीं
ठहराया गया। शायद
यही वजह है कि इधर
हाल में जब दिल्ली के
मुनीरिका इलाके में
दिल्ली महिला आयोग
ने 16 नेपाली लड़कियों
को दलालों के
चंगुल से छुड़ाया
गया, तो भी इसकी ज्यादा
उम्मीद नहीं बंधी
कि कोई सरकार
और प्रशासन भविष्य
में इस समस्या
की पुख्ता रोकथाम
की व्यवस्था कर
पाएगा। इस मामले
में स्थिति यह
है कि नेपाल
से तस्करी कर
लाई गई लड़कियों
को मुनीरिका की
जिस जगह से छुड़ाया गया, वह पुलिस थाने
से महज 500 मीटर
दूर स्थित है,
अरसे से नौकरी
दिलाने के नाम पर लड़कियों
को वहां लाया
जा रहा था, लेकिन उसकी
भनक पुलिस को
नहीं लगी। यह भी उल्लेखनीय
है कि इन्हीं
के साथ आई सात लड़कियों
को पहले ही कुवैत और
इराक भेजा जा चुका है।
मानव तस्करी की
कई विडबंनाएं हैं।
जैसे में संयुक्त
राष्ट्र (यूएन) के
ड्रग्स एंड क्राइम
ऑफिस के मुताबिक
हर साल करीब
25 लाख लोग इसके
शिकार होते हैं।
इनमें से 80 फीसद
महिलाएं और बच्चे
होते हैं। इस बारे में
यूनिसेफ के भी कुछ आंकड़े
हैं। यूनिसेफ का
कहना है कि हर साल
करीब 12 लाख बच्चों
(ज्यादातर लड़कियों) को मानव तस्करी में
लगे रैकेट के
जरिए एक देश से दूसरे
देश पहुंचाया जाता
है। कई देशों
में तस्करी कर
लाए गए लोगों
को शरणार्थी के
तौर पर देखा जाता है
और चूंकि वहां
पुख्ता एंटी ट्रैफिकिंग
कानून नहीं हैं
या उनके दूसरे
देशों से सूचना
बांटने और कार्रवाई
करने के करार नहीं हैं,
इसलिए ऐसे लोगों
के भविष्य को
लेकर लापरवाही बरती
जाती है। ऐसे में मानव
तस्करी में लगे लोगों को
इस अवैध धंधे
में फायदा ज्यादा
और खतरा कम होता है।
सवाल है कि ह्युमन ट्रैफिकिंग
में लाए गए लोगों का
आखिर क्या होता
है? तो इसका अहम जवाब
है यौन शोषण।
गरीब, गृहयुद्ध में
फंसे और उपेक्षित
देशों से जबरन या धोखे
से लाई गई लड़कियों में से करीब 80 फीसद को इसी धंधे
में धकेला जाता
है। यूरोपीय देश
और खाड़ी के
कुवैत-इराक जैसे
देशों में ले जाई गई
लड़कियों से जबरन
देह व्यापार कराया
जाता है। यूरोप
इसके लिए एक पसंदीदा ठिकाना है
क्योंकि वहां देह
व्यापार में अच्छी
कमाई होती है।
इस समस्या से
पीड़ित होने वालों
में एशियाई देश
सबसे आगे हैं क्योंकि गरीबी और
भुखमरी से बचने के लिए
कई बार लोग खुद ही
अपने परिवारों की
लड़िकयों को दलालों
के हाथों सौंप
देते हैं। एक बार इस
दलदल में फंसने
के बाद महिलाओं
को वहां से निकाल पाना
कतई आसान नहीं
होता है। हालांकि
एक तय यह भी है
कि देशों के
भीतर एक राज्य
से दूसरे राज्य
में होने वाली
मानव तस्करी अंततराष्ट्रीय
तस्करी से कई गुना ज्यादा
होती है। इसमें
संदेह नहीं है कि मानव
तस्करी के ज्यादातर
मामलों में यह जानना काफी
मुश्किल होता है कि मजदूरी
या छोटी-मोटी
नौकरी के नाम पर एक
देश से दूसरे
देश में अवैध
रास्तों और तरीकों
से धकेले गए
लोग स्वेच्छा से
ऐसा करते हैं
या उन्हें बहला-फुसलाकर इसके लिए
राजी कराया जाता
है। लेकिन समस्या
की विकरालता को
देखते हुए यह सुनिश्चित करने की जरूरत है
कि आप्रवासन के
नाम पर हो रहे गोरखधंधे
पर रोक लगाई
जाए और आप्रवास
के पूरे मामले
को कानूनी दायरों
में लाया जाए?खास तौर
पर महिलाओं की
दुर्दशा के संबंध
में ऐसा करने
की तत्काल जरूरत
है। मानव अंगों
की सप्लाई, जबरन
मजदूरी, भीख मंगवाने,
शादी के लिए छल करने
और शादी के बाद महिलाओं
और उनके बच्चों
की तस्करी करने
जैसे जैसे अपराध
मानव तस्करी के
रूप में हो रहे हैं।
ऐसे भी मामले
सामने आए हैं जब लड़कियों
को वक्त से पहले जवान
करने के वास्ते
उन्हें हॉर्मोन्स के
इंजेक्शन दिए गए
ताकि देह व्यापार
की जरूरतों को
पूरा किया जा सके। इंसान
चूंकि अच्छे जीवन
की खोज के लालच से
बाहर नहीं जा पाता है,
लिहाजा मानव तस्करी
की पूरी तरह
रोकथाम कर पाना किसी भी
देश या सरकार
के लिए आसान
नहीं है। लेकिन
अवैध घुसपैठ पर
अंकुश लगाकर और
वीजा-पासपोर्ट की
वैधताओं को सुनिश्चित
करने वाली व्यवस्थाएं
बनाकर इस पर कुछ हद
तक काबू पाया
जा सकता है।
मानव तस्करी की
सूचनाओं को सरकारें
और प्रशासन गंभीरता
से लें और उन पर
कार्रवाई करें तो
ही इस दिशा में कुछ
बदलाव संभव है।
सरहदें पार करने
के रास्ते वैध
हों और पुलिस-प्रशासन तस्करी की
हर मुमकिन कोशिश
को रोकें, तो
हालात बदले जा सकते हैं।
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Tuesday, 31 July 2018
Thursday, 23 November 2017
हुक-अप कल्चर के साइड इफेक्ट्स
यौन संबंधों के खुलेपन
ने पश्चिमी देशों में हुक-अप कल्चर को जन्म दिया है। इसका अर्थ है बिना किसी भावनात्मक
संबंध या दीर्घकालीन जिम्मेदारी के किसी से भी यौन संबंध स्थापित करना, फिर चाहे वह
बिल्कुल अजनबी ही क्यों न हो। हुक-अप कल्चर में ऐसे भी उदाहरण रहते हैं कि जिन दो पार्टनर्स
में सेक्स रिलेशन बना, वे एक-दूसरे का पता तो क्या, नाम तक नहीं जानते। अजनबी पार्टनर
ज्यादातर पार्टियों, पबों और बारों में मिल जाते हैं। इसके लिए प्रायः ‘कैजुअल सेक्स’ और ‘वन नाइट स्टैंड’ का उपयोग किया जाता है
लेकिन इन दोनों में एक बारीक भिन्नता है। रातभर में जब-तब कुछ भावनात्मक रिश्ते भी
बन जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार कुछ पश्चिमी देशों में लगभग 50 प्रतिशत वयस्क हुक-अप
कल्चर के कम से कम एक अनुभव से गुजर चुके हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में इसका प्रचलन
अधिक है।
हुक-अप की शुरुआत तो
शारीरिक सुख पाने के लिए की गई पर इसका कल्चर फैलने के कुछ समय बाद ही गंभीर समस्याएं
सामने आने लगीं। जैसे डिप्रेशन और मानवीय संबंधों में बढ़ता खोखलापन। शुरू में केवल
धार्मिक संगठनों ने नैतिक आधार पर इसका विरोध किया पर अब वैज्ञानिक तर्क व अध्ययन के
आधार पर भी इसकी मुखालफत होने लगी है। बाहरी तौर पर यह प्रवृत्ति लोगों को आकर्षक लगती
है इसलिए यह चिंता बढ़ रही है कि कहीं विकासशील व निर्धन देशों में भी देखादेखी इसका
प्रसार न बढ़ जाए। सचाई यह है कि अपने यहां भी कुछेक दायरों में इसका प्रचलन शुरू हो
चुका है।
पश्चिमी समाज में हुक-अप
कल्चर की जमीन पहले से तैयार हो रही थी। एक से अधिक पार्टनर की प्रवृत्ति को वहां विभिन्न
देशों में सामाजिक मान्यता मिलने लगी थी। ब्रिटेन के नैशनल सर्वे ऑफ सेक्शुअल ऐटिट्यूड्स
ऐंड लाइफ स्टाइल में पुरुष के जीवनकाल में औसतन 11.7 और महिलाओं के औसतन 7.7 पार्टनर
होने की बात कही गई पर इसमें अतिशयोक्ति हो सकती है। सामान्यतः 7 से 5 पार्टनर होने
की संभावना अधिक व्यापक तौर पर उपस्थित है। स्वीडन के एक सर्वेक्षण में 55 वर्ष आयुवर्ग
के आसपास के पुरुषों में से 14 प्रतिशत ने जीवनकाल में 30 या अधिक पार्टनर होने की
बात कही। वहां के एक विश्वविद्यालय ने छात्राओं के सर्वेक्षण के बाद बताया कि पहले
किए गए सर्वेक्षण की अपेक्षा पार्टनर दोगुना बढ़े हैं और अभी औसत पार्टनर संख्या 11
है। इस तरह मल्टी-पार्टनर कल्चर को जो स्वीकृति पहले से मिली थी उससे ही हुक-अप कल्चर
का तेज प्रसार हो सका।
इसके लिए मुख्य औचित्य
यह दिया गया कि जब दो वयस्क आपसी स्वीकृति से बने संबंध में प्रसन्नता प्राप्त कर रहे
हैं तो इसपर किसी को आपत्ति नहीं करनी चाहिए। इतना ही नहीं, यह दावा भी दिया गया कि
ऐसा माहौल बनने से यौन हिंसा अपने आप कम हो जाएगी। पर शीघ्र ही इस विषय पर हुए अनेक
अनुसंधानों से ये मिथक टूटने लगे। कुछ अध्ययनों में यह सामने आया कि कुछ हुक-अप बाहरी
तौर पर भले ही सहमति के लगें पर शराब, नशीली दवाओं व तरह-तरह की चालाकियों के उपयोग
से इनमें स्थिति प्रायः यौन शोषण वाली ही बन जाती है। लिजा वेड नामक अनुसंधानकर्ता
ने विशेषकर विश्वविद्यालय परिसरों के संदर्भ में हुक-अप पर लिखी अपनी पुस्तक में बताया
कि महिला चाहे अपनी मर्जी से आई हो लेकिन एक बार फंस जाने पर उसकी मर्जी के बिना भी
बहुत कुछ होता है। हुक-अप की वारदात के बाद पार्टनरों ने, विशेषकर महिलाओं ने डिप्रेशन,
आत्मग्लानि, शर्म और भावनात्मक समस्याओं से गुजरने की शिकायत की। हुक-अप में वृद्धि
के बाद यौन-हिंसा अनेक स्थानों पर कम होने के बजाय और बढ़ गई।
अमेरिका में हर तीन में
से एक किशोरी डेटिंग के समय अपने पार्टनर से किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार हुई।
वहां एक वर्ष में बलात्कार व सेक्शुअल असॉल्ट के औसतन 3,21,500 मामले दर्ज होते हैं।
बाल यौन शोषण की दर भी वहां बहुत अधिक है। सामान्य यौन हमलों में 70 प्रतिशत व बाल
यौन अपराधों में 90 प्रतिशत से ज्यादा अपराधी महिलाओं व बच्चों की जान-पहचान के होते
हैं। स्वीडन के जिस विश्वविद्यालय में पार्टनर दोगुने होने का परिणाम सामने आया, उसी
सर्वेक्षण ने यौन संक्रमण रोग दोगुने होने की पुष्टि भी की। वर्ष 2015 में अमेरिका
में इनके लगभग दो करोड़ नए केस सामने आए। नॉर्डिक सेंटर फॉर वेलफेयर ऐंड सोशल इशूज ने
स्वीडन के युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के अध्ययन में बताया कि वर्ष 1980
से 2003 के बीच 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग की किशोरियों में डिप्रेशन का इलाज करवाने वालों
की संख्या आठ गुनी बढ़ गई।
इस तरह की स्डटीज से
पता चलता है कि आत्मीय व भावनात्मक संबंधों की जगह यदि मात्र दैहिक रिश्तों को महत्व
दिया जाए तो इससे भावनात्मक स्तर पर खोखलापन आता है जिससे मानसिक समस्याएं बढ़ सकती
हैं। इससे महिलाओं को सेक्स ऑब्जेक्ट मानने की प्रवृत्ति बढ़ती है जिससे यौन हिंसा
में भी वृद्धि होती है। हुक-अप कल्चर के भारत जैसे विकासशील देशों में फैलने की आशंका
भी बनी हुई है क्योंकि कुछ लोग नकल में इसे अपना रहे हैं। कुछ इसे स्वतंत्रता और आधुनिकता
का पर्याय बताते हैं पर इसकी परिणति देख लेने के बाद भी इसे अपनाने का कोई अर्थ नहीं
है। जरूरी है कि इस संबंध में वास्तविक स्थिति लोगों के सामने आए। इसके लिए समाज के
प्रबुद्ध तबके को आगे आना होगा।
लेखक: भारत डोगरा
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