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Wednesday, 26 September 2018

कैसे धुलें दाग



दागी नेताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भारतीय लोकतंत्र के रिसते हुए जख्मों पर मरहम लगाने जैसा है। कोर्ट ने कहा है कि दागी विधायक, सांसद और नेता आरोप तय होने के बाद भी चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें खुद पर निर्धारित आरोप भी प्रचारित करने होंगे। पिछले दिनों याचिका दायर कर मांग की गई थी कि गंभीर अपराधों में, यानी जिनमें 5 साल से अधिक की सजा संभावित हो, यदि व्यक्ति के खिलाफ आरोप तय होता है तो उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए। अदालत ने कहा कि केवल चार्जशीट के आधार पर जनप्रतिनिधियों पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। लेकिन चुनाव लड़ने से पहले उम्मीदवारों को अपना आपराधिक रिकॉर्ड चुनाव आयोग के सामने घोषित करना होगा। अदालत ने इस मामले में एक गाइडलाइन जारी की, जिसके अनुसार राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के नामांकन के बाद कम से कम तीन बार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए उनके आपराधिक रिकॉर्ड मतदाताओं के सामने रखेंगे। सभी पार्टियां वेबसाइट पर दागी जनप्रतिनिधियों के ब्यौरे डालेंगी ताकि वोटर अपना फैसला खुद कर सकें। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कहा कि वक्त गया है कि संसद कानून बनाकर आपराधिक रिकॉर्ड वालों को जनप्रतिनिधि बनने दे। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय स्पष्ट कर दी है कि उसका यह तय करना कि कौन चुनाव लड़े कौन नहीं, जनतंत्र के मूल्यों पर आघात होगा। सबसे आदर्श स्थिति यही होगी कि मतदाताओं को इतना जागरूक बनाया जाए कि वे खुद ही आपराधिक छवि वाले कैंडिडेट को रिजेक्ट कर दें। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ऐसे लोगों को जनप्रतिनिधि बनने देने की जिम्मेदारी संसद की है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस बार जो उपाय सुझाए हैं, उनका वाजिब असर चुनाव आयोग ही सुनिश्चित कर सकता है। राजनीतिक दल अपनी साइटों पर और मीडिया में अपने उम्मीदवारों का आपराधिक रिकार्ड डालने के मामले में खानापूरी करेंगे तो जनता तक इसकी जानकारी नहीं पहुंच पाएगी। ऐसे में चुनाव आयोग को इन सभी कामों के लिए कुछ ठोस मानक तय करके उन पर अमल सुनिश्चित करना होगा। कई दागी नेता आज कानून-व्यवस्था के समूचे तंत्र को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। उनके खिलाफ मामले थाने पर ही निपटा दिए जाते हैं। किसी तरह वे अदालत पहुंच भी जाएं तो उनकी रफ्तार इतनी धीमी रखी जाती है कि आरोप तय होने से पहले ही आरोपी की सियासी पारी निपट जाती है। इसका हल फास्ट ट्रैक कोर्ट के रूप में खोजा गया, लेकिन कई राज्यों में ये कोर्ट बने ही नहीं और जहां बने भी वहां कागजों से नीचे नहीं उतर पा रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की कोशिशें खुश तो करती हैं लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन टिक नहीं पाती।

               

Friday, 14 September 2018

दागियों पर दबिश


जन प्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों को जल्द से जल्द से निपटाने के लिए विशेष अदालतों के गठन में सुस्ती बरते जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। बुधवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए उसने विभिन्न राज्यों के मुख्य सचिवों और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रारों से 10 अक्टूबर तक यह बताने को कहा है कि ये अदालतें क्यों नहीं बनाई जा रही हैं/ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने यह भी जानना चाहा है कि 11 राज्यों में जो 12 विशेष अदालतें गठित की गई हैं, वे काम भी कर रही हैं या नहीं/ खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों के कामकाज की निगरानी करेगा। याद रहे, सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर 2017 को केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि सांसदों-विधायकों से जुड़े मामलों की तेज सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट बनाए जाएं। यह भी कि इन विशेष अदालतों में 1 मार्च 2018 तक काम शुरू हो जाना चाहिए। लेकिन सचाई यह है कि ज्यादातर राज्यों में ये फास्ट ट्रैक कोर्ट अब तक जमीन पर नहीं उतर पाए हैं। भाषणों में सारे ही राजनेता देश की राजनीति को अपराधमुक्त करने की बात करते हैं लेकिन जब इसके लिए ठोस कदम उठाने की बारी आती है तो उन्हें सांप सूंघ जाता है। न्यायपालिका की पहल से ही राजनीति के अपराधीकरण में कुछ कमी आई है, या आने की उम्मीद जागी है। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने जन प्रतिनिधित्व कानून की उस धारा को असंवैधानिक करार दिया था, जिसके तहत निचली अदालतों द्वारा दोषी ठहराए गए सांसद-विधायक अपने पद के लिए तुरंत अयोग्य नहीं घोषित होते थे। यह प्रावधान दोषियों को हाई कोर्ट में अपील करने के लिए तीन महीने की मोहलत देता था, जहां से स्टे मिलने पर ये पद पर बने रह सकते थे। मगर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद किसी भी अदालत में दो साल से ज्यादा की सजा पाने वाले जन प्रतिनिधि अपने पद पर रहने और सजा की अवधि तक चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए। लालू यादव और स्व. जयललिता जैसी लीडर पर इसका सीधा असर पड़ा। उस फैसले के समय ही यह महसूस किया गया कि नेताओं के खिलाफ मामले बहुत धीरे चलते हैं और फैसला आने तक वे काफी लंबी राजनीतिक पारी खेल चुके होते हैं। इसी को ध्यान में रखकर राज्यों में विशेष अदालतें बनाने का निर्णय किया गया। लेकिन इससे भी बात बनती नहीं दिख रही। दरअसल यहां स्थानीय पुलिस और अभियोजन पक्ष का काम काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है क्योंकि उन्हें जनसमर्थन वाले काफी ताकतवर लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करके मुकदमा चलाना पड़ता है। ऐसे में प्राय: मामले का ठिठक कर रह जाना ही स्वाभाविक होता है। अभी सुप्रीम कोर्ट के संकल्प को देखते हुए बात कुछ आगे बढ़ती हुई सी लग रही है, लेकिन समस्या तभी सुलझेगी जब राजनीतिक नेतृत्व पर नागरिक दायरे की ओर से लगातार दबाव बनाए रखा जाए।

ବିଲୁଆଖାଇର ଭୟ- ଛବିରାଣୀ ମର୍ଡର ମିଷ୍ଟ୍ରିକୁ ନେଇ ସ୍ବତନ୍ତ୍ର ଉପସ୍ଥାପନା।

୧୯୮୦   ମସିହା ଅକ୍ଟୋବର ୨ ୩ ତାରିଖ ରାତି ପ୍ରାୟ ୯ଟା। ସବୁଠି ଅନ୍ଧାର ତା ' ର ସମ୍ରାଜ୍ୟ ବିସ୍ତାର କରିସାରିଥିବା ବେଳେ ହାଲୁକା ଶୀତୁଆ ପବନରେ ଦେହ ଶୀଦେଇ ଯାଉଥାଏ...