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Monday, 29 April 2019

कौन रोक पाएगा राजनीति में अपराधियों व धनबलियों को ?

सबने भ्रष्टाचार और अपराधीकरण पर गंभीर चिंता प्रकट की।पर आज तक जब कुछ नहीं हुआ तो कहा जा सकता है कि उन्होंने तब घडि़याली आंसू ही बहाए थे।

 इस चुनाव के दौरान जितने अधिक पैसों की जब्ती हुई है,वह एक रिकाॅर्ड है।इन पैसों का इस्तेमाल चुनाव को प्रभावित करने के लिए होने वाला था। पर, इसके अलावा कितने पैसे इस बार भी जब्ती से बच गए,उसका तो सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।
अनेक राज्यों से यह खबर आती रहती है कि मतदाताओं के बीच उपहारों के अलावा नकद पैसे भी बांटे जा रहे हैं।यह काम बड़े पैमाने पर हो रहा है।इसका कितने मतदाताओं पर कितना असर होता रहा है,यह शोध और जांच का विषय है।
एक और चलन व्यापक होता जा रहा है।चुनाव की टिकटें खुलेआम बेची जा रही है।पहले एक या दो राजनीतिक दल ऐसा करते थे।अब ऐसे दलों की संख्या बढती़ जा रही है।कोई भी ‘धनपशु’ सरीखा नेता दल बदल कर किसी भी दल से टिकट हासिल कर रहा है।अपवादों की बात और है।
इतना ही नहीं,राजनीति में मलीनता के और भी लक्षण सामने आते जा रहे हैं।
वे तो अधिक गंभीर हैं।
इस बार जितनी बड़ी संख्या में बाहुबली और उनके परिजन चुनाव लड़ रहे हैं,वह भी एक रिकाॅर्ड ही है।वंशवाद और परिवारवाद की समस्या अलग है।इस समस्या के कारण तो कतिपय दल बर्बादी के कागर पर हैं।पर उसकी परवाह किसे है ?
दलों व नेताओं के बड़े -बड़े दावों और सुनहरे सपनों के बीच ये तत्व देश की राजनीति को बुरी तरह बदरंग कर रहे हैं।
इस पर आखिर कौन और कब काबू पाएगा ?
क्या अब काबू पाया भी जा सकेगा या नहीं !
यह एक बड़ा सवाल है जिसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
वैसे आधे मन से प्रयास तो राजनीतिक व्यवस्था की तरफ से भी होते रहे हंै।
कुछ दल खुलेआम कहते रहे हैं कि हम बाघ के खिलाफ बकरी को तो चुनाव में खड़ा नहीं कर सकते !
बाघ यानी खूंखार अपराधी और बकरी से उनका आशय शरीफ आदमी से होता है।
भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ सबसे गंभीर प्रयास सन 1997 में भारतीय संसद ने किया था।
आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर जब लोक सभा के अंदर ही दो बाहुबली सांसदों ने आपस में मारपीट कर ली तो पूरी संसद चिंतित हो उठी।
इस पर संसद की विशेष बैठक हुई। सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया गया।प्रस्ताव के जरिए ‘भ्रष्टाचार समाप्त करने ,राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के साथ- साथ चुनाव सुधार करने का संकल्प भी किया गया।
जनसंख्या वृद्धि,निरक्षरता और बेरोजगारी को दूर करने के लिए जोरदार राष्ट्रीय अभियान चलाने का भी संकल्प किया गया।’
मुख्यतः भ्रष्टाचार व अपराध विरोधी उस प्रस्ताव को प्रतिपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने सदन में रखा था।
तब प्रधान मंत्री इंदर कुमार गुजराल थे।
स्पीकर पी.ए.संगमा ने भी लीेक से हटकर उस प्रस्ताव पर लोक सभा में भाषण किया था। कुल 218 सदस्य बोले थे।
सबने भ्रष्टाचार और अपराधीकरण पर गंभीर चिंता प्रकट की।पर आज तक जब कुछ नहीं हुआ तो कहा जा सकता है कि उन्होंने तब घडि़याली आंसू ही बहाए थे।
दोनों सदनों ने एक जैसे प्रस्ताव पास किये ।प्रस्ताव की प्रति पर लोक सभा के अध्यक्ष पी.ए.संगमा और राज्य सभा के सभापति कृष्णकांत सहित सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किये थे।प्रस्ताव सदन की कार्यवाही का हिस्सा बन गया।
पर अंततः क्या हुआ ? उन नेताओं ने जिन्होंने संसद में घडि़याली आंसू बहाए थे,अपराध व भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई कारगर उपाय नहीं किए।
दरअसल राजनीति में अपराधियों के प्रवेश की भी पृष्ठभूमि है।
इस देश में औसतन सिर्फ 46 प्रतिशत आरोपितों को ही अदालतों से सजा हो पाती है।
कई राज्यों में सजा का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम है।
यानी वहां अपराधियों का एक गिरोह समाज के एक हिस्से को और दूसरा गिरोह दूसरे हिस्से को ‘न्याय’ दिलाता है या रक्षा करता है।भले यह अधूरा न्याय है ,पर कुछ तो है।नतीजतन ऐसे अपराधी अपने -अपने समाज के हीरो बन रहे हैं।वे चुनाव लड़ते हैं।कुछ जीत भी जाते हैं।
सिद्धांत-निष्ठा व कार्यकत्र्ता विहीन होते राजनीतिक दलों के लिए यह आसान हो गया है कि ऐसे अपराधियों को टिकट देकर जीत के लिए निश्चिंत हो जाया जाए।
यदि इस बीच किसी अपराधी को सजा हो गई तो उसके परिजन को राजनीतिक दल टिकट दे देते हैं।
इससे कानून का शासन कायम करने में और भी दिक्कतें आने लगी हैं।
इधर राजनीति का अपराधीकरण बढ़ता जा रहा है।
अपराधी से जन प्रतिनिधि बने नेतागण अपने प्रभाव क्षेत्र में ऐसे अफसरों की तैनाती में भी भूमिका निभाते हैं जो उनके अपराधों की ओर से आंखें मूंदे रहें।
इस पृष्ठभूमि में अपराध व भ्रष्टाचार पर काबू पाना दिन प्रति दिन कठिन होता जा रहा है।
इस स्थिति पर काबू पाने के लिए सर्वाधिक जरूरी यह है कि अदालतों से सजाओं का प्रतिशत बढ़ाया जाए।क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को मजबूत किया जाए।
पर इसे करेगा कौन ?
किसी मसीहा के इंतजार के सिवा आम लोगों के सामने कोई अन्य उपाय फिलहाल नजर ही नहीं आ रहा है।
(वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)

Wednesday, 26 September 2018

लड़कों के यौन शोषण की अनदेखी क्यों





सुप्रीम कोर्ट ने हाल के अपने एक फैसले में कहा कि दुष्कर्म और तेजाब पीड़ितों को मुआवजा देने की योजना में नाबालिग लड़कों और पुरुषों को भी शामिल किया जाए। यह निर्णयजेंडर इक्वलिटीकी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। बीते दिनों राजस्थान के एक प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल की ग्यारहवीं कक्षा के छात्र का सीनियर विद्यार्थियों ने शारीरिक शोषण किया, जिसकी शिकायत उसके अभिभावकों ने की। मगर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने के बावजूद हर स्तर पर इस मामले को दबाने का प्रयास किया गया। राज्य के मीडिया ने इस मुद्दे को लगातार एक महीने तक उठाया। बावजूद इसके, समाज और प्रशासन के स्तर पर एक चुप्पी सी छाई रही, जैसे यह कोई बड़ी सामान्य सी बात हो।

सोच में गड़बड़ी
सर्वे बताते हैं कि लड़कियों के यौन शोषण के मामले में पुलिस अब जल्दी सक्रिय हो जाती है। लेकिन लड़कों के ठीक ऐसे ही मामले में कुछ खास ध्यान नहीं दिया जाता। सच तो यह है कि लड़कों के साथ हो रहे इन यौन अपराधों के लिए कानूनी पहलू से कहीं ज्यादा सामाजिक सोच जिम्मेदार है। समाज मानकर चलता है कि यौन शोषण तो लड़कियों का ही हो सकता है। यह बात आमतौर पर दिमाग में नहीं आती कि इसका शिकार लड़के भी होते हैं। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की सन् 2007 की रिपोर्ट बताती है कि देश में 52.22 प्रतिशत बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पडा, और इनमें से 52.94 प्रतिशत लड़के इसका शिकार हुए। लेकिन यह खासा हैरान करने वाला तथ्य है कि इस सत्य के उजागर होने के बाद भी तो इस संबंध में विधायी संस्थाओं में कोई चर्चा की गई और ना ही किसी शोध पर जोर दिया गया।

कुछ समय पूर्व हुए एससीईआरटी (स्टेट काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) हरियाणा के सर्वे में खुलासा हुआ है कि लड़कियों के मुकाबले लड़के यौन शोषण के ज्यादा शिकार हो रहे हैं। यह कोई हैरान करने वाला तथ्य नहीं बल्कि प्रयासपूर्वक सालों से छिपाया जाने वाला नंगा सच है, जिसे निरंतरमिथककहकर झुठलाया जा रहा है। आमतौर पर लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। सोचते हैं कि यह कोई बड़ी बात नहीं है। इससे कोई खास नुकसान नहीं होता। इंडियन जर्नल ऑफ साइकेक्ट्री ने 2015 में एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें कुछ यौन पीड़ितों का उल्लेख किया गया था। इसमें एक प्रसंग 9 वर्ष के पीड़ित बालक का था। उसके पिता ने अपने बेटे के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श का विरोध करते हुए दलील दी थी कि इससे तो वह अपना कौमार्य खोएगा, ही गर्भवती होगा। उसे एक मर्द की तरह व्यवहार करना चाहिए, कि किसी डरपोक इंसान की तरह।

यह सोच एक व्यक्ति की नहीं, अमूमन संपूर्ण समाज की है। सवाल यह है कि अगर शारीरिक शोषण से किसी का कौमार्य भंग नहीं होता तो क्या इसे अपराध नहीं माना जाएगा? यौन शोषण के शिकार पुरुषों को भी महिलाओं के समान ही पीड़ा और मानसिक आघात झेलना पड़ता है। इसके साथ ही उन्हें समाज द्वारा मजाक बनाए जाने का डर भी सताता है, जो कई बार उन्हें अवसाद में धकेल देता है। जिस तरह लड़कियां अपने घर में असुरक्षित हैं, वैसे ही छोटे लड़के भी यह खतरा झेलते हैं। कई बार तो उन्हें अपने रिश्तेदारों के ही हमले का शिकार होना पड़ता है। स्कूलों में उन्हें शिक्षकों, अन्य कर्मचारियों या सीनियर छात्रों से खतरा रहता है। पर हादसा होने पर भय या संकोच के मारे ‌‌‌‌‌‌‌‌वे लंबे समय तक किसी से कुछ नहीं कहते और अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। कई बच्चे तो समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ हो क्या रहा है। इसका उनके व्यक्तित्व पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे बच्चे आगे चलकर काफी कुंठित और असहज हो जाते हैं। कुछ बच्चे अपने परिवार में इस तरह की बात बताते भी हैं, तो उन्हें चुप रहने के लिए कहा जाता है।

2010 में ईटी-साइनोवेट ने देश के सात शहरों में एक सर्वे कराया जिसमें बंगलुरु के 32 प्रतिशत पुरुषों ने अपने साथ यौन उत्पीड़न की बात मानी। पुरुष यौन उत्पीड़न को हल्के तौर पर लेने वालों को पता होना चाहिए कि 2015 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पाया कि भारतीय जेलों में खुदकुशी की बड़ी वजह साथी कैदियों द्वारा किया गया दुष्कर्म है। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थावर्ल्ड विजन ऑफ इंडियाने साफ कहा है कि भारत में हर साल यौन शोषण के जितने भी मामले सामने आते हैं, उनमें लड़के-लड़कियों की संख्या करीब-करीब बराबर ही होती है। पुरुषों को यौन शोषण से बचाने या पीड़ितों को परामर्श देने के लिए देश भर में करीब 40 गैर सरकारी संगठनों ने मिलकर एक हेल्पलाइन शुरू की है।

समान हो कानून
देश में जेंडर न्यूट्रल कानून की दरकार है। जस्टिस वर्मा कमिटी ने बलात्कार कानून को लिंग-निरपेक्ष बनाने की अनुशंसा की थी। पॉक्सो कानून में जो हालिया बदलाव हुए वे 12 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ दुष्कर्म में मौत की सजा का प्रावधान बिना किसी लैंगिक भेद के करते हैं। लेकिन उसके बाद यह कानून यौन शोषण को स्त्री से ही जोड़ कर देखता है। क्या यह संविधान की उस मूल भावना की उपेक्षा नहीं है, जिसके अनुसार समाज में सभी को बिना किसी लिंग भेद के न्याय प्राप्त करने का अधिकार है? पुरुषों के साथ यौन शोषण का कानून वैसा ही सख्त होना चाहिए, जैसा महिलाओं के साथ रेप के मामले में है। अभिभावकों को अपनी बेटियों के साथ ही बेटों को लेकर भी सचेत रहना होगा। बचाव के तरीके उन्हें दोनों को समान रूप से बताने होंगे।

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लेखिका: ऋतु सारसवत

ବିଲୁଆଖାଇର ଭୟ- ଛବିରାଣୀ ମର୍ଡର ମିଷ୍ଟ୍ରିକୁ ନେଇ ସ୍ବତନ୍ତ୍ର ଉପସ୍ଥାପନା।

୧୯୮୦   ମସିହା ଅକ୍ଟୋବର ୨ ୩ ତାରିଖ ରାତି ପ୍ରାୟ ୯ଟା। ସବୁଠି ଅନ୍ଧାର ତା ' ର ସମ୍ରାଜ୍ୟ ବିସ୍ତାର କରିସାରିଥିବା ବେଳେ ହାଲୁକା ଶୀତୁଆ ପବନରେ ଦେହ ଶୀଦେଇ ଯାଉଥାଏ...